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Thursday, March 18, 2010

फुटपाथ पर भटकते लावारिस बच्चों से

महाराष्ट्र में प्रांतवाद की राजनीति से आहत होकर मैंने ये कविता दो साल पहले लिखी थी ......

डरावने सपनों का दौर

फुटपाथ पर भटकते लावारिस बच्चों से
कभी पूछा जा सकता है कि कहाँ से आए हो मुंबई शहर में
बिहार, उत्तेर प्रदेश,उडीसा या महाराष्ट्र के उन आदिवासी क्षेत्रों से जहाँ कुपोषण मुंह बाए खड़ा है
कूड़ा बीनने ,बन्दर नचाने ,भीख मांगने और मजदूरी करने के लिए
किसने तुम्हें हाथ में कलम देने के बदले ढाबों में प्लेट थमा दिए ?
जब दिन भर कड़ी मेहनत करने के बाद एक बड़ा पाव खाकर
तुम फुटपाथ पर बोरा बिछा कर सो जाते हो
और जब मच्छरों का झुंड तुम पर हमला कर देता है तो कैसे डरावने सपने आते हैं ?
क्या तुमसे कोई यह पूछने आता है कि तुम्हारा वो घर कहाँ है जहाँ तुम्हारी माँ रहती है?

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